Bharatvasiyo
Ab aap se kya kahen...
Sunday, May 12, 2013
खुशी
जंगल में
बरसों से
उदास खङे
पेङ ने
लकङहारे को
कुल्हाङी लिए
आते देखा...
पेङ आज
बहुत खुश था।
-हरीश हैरी
Sunday, May 5, 2013
छाया-चित्र:आठ
सिर पर
चढ़ी धूप तो
पैर पकङ कर
खूब रोई छाया
-हरीश हैरी
छाया-चित्र:सात
दोपहर में
आग बबूला होते
सूरज को देखकर
डर के मारे
दिवार से
बच्ची की तरह
लिपट गई छाया।
-हरीश हैरी
छाया-चित्र:छह
सूरज दिनभर था
धूप के साथ।
शाम को
दिवार से
पीठ लगाए
उदासबैठी थी
छाया।
-हरीश हैरी
छाया-चित्र:पाँच
सूरज की
शह पर
धूप ने
पेङ के नीचे
बैठी छाया को
अकेली देखकर
चारों तरफ से
घेर लिया।
-हरीश हैरी
छाया-चित्र:चार
जून की
दोपहर में
सूरज से
नहीं मिली
छाया।
दिसम्बर में
छाया करती रही
इंतजार
रूठा सूरज
घर से
बाहर नहीं
निकला।
-हरीश हैरी
छाया-चित्र:तीन
बादलों की फौज
उलझ पङी
सूरज से
मरती छाया
फिर से हो गई
जिंदा।
-हरीश हैरी
राजस्थानी कविता-“आस्था"
गळी में
लङतां गोधां नै
नीं छुङा सक्या
गाँव आळा पाँच-सात
लठ्ठधारी मिनख
माऊ बोल दियो
सवा पांच रो परसाद
गोधां अळगा जांवता रैया।
-हरीश हैरी
छाया-चित्र:दो
भरी दोपहर में
देर तक चला
धूप-छाया का
युद्ध।
हारकर
पेङ के नीचे
बैठ गई
बेचारी छाया।
-हरीश हैरी
छाया-चित्र:एक
तपती दोपहर में
सूरज
खङा करता रहा
इंतजार
छाया
घर से
बाहर नहीं
निकली।
-हरीश हैरी
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