Sunday, April 17, 2016

एक राजस्थानी डांखळो



किसान रो पाडोसी हो बाबूलाल बजाजगी
किसान सूं होगी एकर बान्नै जबरी नाराजगी
किसान करी जुगत
स्याम रे बगत
दो बाल्टी कानां तक भरगे दे आयो प्याजगी

-हरीश हैरी

कविता-“शब्द यात्री"


समय के मार्ग पर
चलते रहे शब्द यात्री
घिसते रहे
घटते रहे
मरते रहे
मृत आत्माओं के साथ
केवल लाशें बची थीं !

-हरीश हैरी

एक राजस्थानी हाईकु


पराई कार
आपणै सारू अब
जमा बेकार

Saturday, January 2, 2016

राजस्थानी कविता-“बाबो-पाँच"


बाबो आज धरती पर कोनी
पर अड़ूवै नै पिरायड़ो
बाबै रो कुड़तो
अजै ई करै रूखाळी
सुना पसुवां स्यूं
बाबै रो रोम रोम
अजे ई खेत में बसै

-हरीश हैरी

राजस्थानी कविता-“बाबो-चार"


खूंटी टांगेड़ो
गुड़-चा रो झोळो
आळै में धरियोडयौ
ढेरियौ अर बंटियौ
खूणै में पड़ी गांठैड़ी मोचड़्यां
भींत रै सारै ऊभी सैंकल
जाणूं पाड़ै हैला
बिड़क सी पड़ै जाणूं
चटकौ करो
खेत नैं हूग्यौ मोड़ौ

-हरीश हैरी

Thursday, November 26, 2015

राजस्थानी कविता-“बाबो-तीन"


बाबो टूटेड़ी चप्पल नै
गांठतै टैम बण जांवतो मोची
छिणी री धार लगांवतै टैम लुहार
पलड़ सीड़तै टैम दर्जी !
तंगळी ठीक करता जद
मिसतरी कद करतो रीस बाबै री !
हरेक चीज नै जोड़-तोड़'र
बाबो कर ई देवंतो जुगाड़
क्यूंक बाबो तो बाबो ई हो !
-हरीश हैरी

राजस्थानी कविता-“बाबो-दो"


अच्छा तो तू मोहन रो छोरो है !
बेटा तेरो बाप जवानपणै मांय
5 थैला यूरिया रा चक देंवतो
किशोरी सेठ रै नोहरै मांय
खळ री पाँच बोरी बण
नितनेम चकणी ई चकणी
मुक्को मार'र ऊंट ने आडो पटक देंवतो
सैकल पर बीस फुटी ट्युबैल री नाळ नै
मोढे पर रख'र सैर सूं चुड़ी कढा ल्यावतों
सैकल नै चालती नै उछाळ देवंतो
जबरो जवान हो !
धोरां मांय फसैड़ी कार नै
हाथां स्यूं चक'र बारै काढ देंवतो !
तेरो बाप एक जग्यां बैठ्यो-बैठ्यो
दो किलो गुड़ खा जांवतो
खुराक खूब ही
दो जणा मिल'र एक बोरी चकता
पण बो सेर एकलो ई दो बोरी
काख मांय घाल ल्यांवतो
माटी मांय पचतो भोत हो
गाँव रे हरेक बडेरै कन्नै बस एई किस्सा हा
जद म्हूं कैंवतो मैं मोहनलाल रो छोरो हूं
-हरीश हैरी

Wednesday, November 25, 2015

राजस्थानी कविता-“बाबो-एक"


आज जैपर रै एक मॉल में
मूंघा सूटां रा पईसा
देवंतै बगत
म्हनै चेतै आयो
इण रो मोल तो
बाबै कई साल पैलां ई
चुका दियो हो
बाबो पंजी-पंजी बचावण सारू
एक ई कुड़तै-पजामे में
काढ देवंता सो सियाळो,
सैर सूं बाई साईकल माथै
ले आंवता खळ री बोरी,
टूटेड़ी चालणी सूं छाण लेंवता चा
अ'र हाथां गांठेड़ी फिड्डी जूती
बाबै री खुद्दारी आगै
सरमां मरती
चाल ई जांवती
कैई महीना और
म्हूं पईसा देंवती टैम
देखूं जाणै बाबो
अजै ई त्यार खड़्या है
सैर जावण सारु
बाईसाइकल  रै हैंडल माथै
 झोळो बांध'र
मुळकता बोल्या
चल मुन्डेया !!

-हरीश हैरी

Wednesday, September 9, 2015

राजस्थानी कविता-“बाड़"


झ्यान जाणै
राड़ सूं बाड़ आछी होवै
म्है बाड़ करली
फैर भी बां
म्हारै साथै राड़ करली.

-हरीश हैरी

राजस्थानी कविता-“मा"

म्हारी मा
म्हारी वकील है
जकी लड़ सकै
म्हारै खातर
सारे झ्यान स्यूँ
बिना फीस लियां.

-हरीश हैरी