Wednesday, January 7, 2015

राजस्थानी कविता-“भींत"


चौभींतै नै
देख'र
खुस होवंतो घर
आँगण बिचाळै
निकळती
भींत नै देख'र
टूटग्यो घर !

-हरीश हैरी

Sunday, December 21, 2014

राजस्थानी कविता-“क्यूँ”


सगळा जाणै
करै जको ई भरै
बै भरण लाग रेया है
फैर भी...
बै करण लाग रेया है

-हरीश हैरी

Wednesday, December 17, 2014

कविता-“अखण्ड अवधूत सूरज"


अखण्ड अवधूत सूरज
अपनी ही धुन में
सदियों से था
तपस्या में रत.
खूब सज-संवर कर आई
धरती अप्सरा
इर्द-गिर्द घूमती रही
मगर कर नहीं पाई
तपस्या भंग !

-हरीश हैरी

कविता-“दिवाना चाँद"


दिवाना चाँद
सब कुछ भूलकर
दिन-रात
चक्कर काटता रहा
धरती के इर्द-गिर्द.
बेखबर धरती
सूरज के अगल-बगल
घूमती नज़र आई.
तेरी-मेरी प्रेम कहानी भी
चाँद-धरती और सूरज जैसी
जो चली आ रही है सदियों से
बिना रुके बिना थमे.
न चाँद को धरती मिली
और न धरती को सूरज.
-हरीश हैरी

राजस्थानी कविता-"धरम भैन"


रास्तै
धरम भैन बणाई
उझङ जग्यां सूं
मटकती निकळ'र
राखङी बांधण आई
पगडांडी बाई।

Monday, November 10, 2014

राजस्थानी कविता-“लिछमी"


लिछमी
गरीबां री जायोड़ी
अमीरां नै परनायोड़ी

-हरीश हैरी

राजस्थानी कविता-“दही"


दूध रो
मा जायड़ो भाई
जावण रै धक्के चढ'र
होग्यो खाटो
फ़ाटग्यो लाई !

-हरीश हैरी

राजस्थानी कविता-“आछा-माडा़ दिन"


जका देवता
सवा रिपीये रै
परसाद में
हो जांवता झट राजी
बै इज देवता
उठग्या
सौ-सौ कोस दूर
सवा मणी सूं ई
नी आया नेड़ै
ओ फरक है फगत
आछा-माड़ा दिनां रो !

-हरीश हैरी

Wednesday, October 29, 2014

राजस्थानी कविता-"पोती"


माऊ आखै साल
पीपळ में
घाल्यो पाणी
कुत्तियां नै देंवती
नित रोटी
गायां नै चरांवती
हरमेस हरयो नीरो
भोत रटती ठाकुरजी नै
भगवान राजी होय'र
पोती दे दीनी

दो साल री पोती
दादी री
आंख्यां बणगी !

-हरीश हैरी

राजस्थानी कविता-"लिछमी"


नवी बीनणी
घर में आंवतै बगत
पगथळी में
धान सूं भरयोङै
कुल्हडिये रै
पग री ठोकर लगाई
खिंडेङै धान नै देख'र
लुगाईयां केवै ही
लिछमी आई है !

-हरीश हैरी